Friday, November 22, 2024

स्वयं अदाणी पर वारंट !

मेरा तो कलेजा सा ही फट गया ख़बर पढ़कर ! ये अमरीकी आखिर कौनसी सदी में जी रहे हैं ??  भारत को स्वतंत्र हुए आठ दशक होने को आए ! और अगर हमारे देश के उद्योगपतियों को हमारे देश के अफसरों को रिश्वत देने की ही स्वतंत्रता ना हो , तो किस बात का स्वतंत्रता दिवस और कैसा उत्सव ! क्या इस दिन के लिए बलिदान दिए थे, कि हमारे औद्योगिक घरानों को इन अंग्रेजों के डर में जीना पड़े! 

देखो सीधी बात तो ये है कि ये लोग जलते हैं | समृद्धि से | जी नहीं , देश की समृद्धि से नहीं , वो तो इनकी हमसे कहीं अधिक है | हमारे अफसरों की समृद्धि से | इनके यहाँ अफसर जीते हैं सरकारी तनख्वाह पर | यहाँ बात हो रही है कुछ ढाई सौ मिलियन की ! इनके कथित अमीर देश के राष्ट्रपति इतना नहीं कमा सकते जीवन में, जितना स्कोप हमारे बड़े बाबू के पास है | इस बात की चिढ़ है | मैं कहता हूँ, ऐसे वक्त में ही व्यक्तित्व की पहचान होती है | क्षीण व्यक्तित्व , जो अक्सर अंग्रेजों में देखा जाता है , वो अपनी रेखा को लम्बी करने की बजाये दूसरी रेखा को मिटाने में विश्वास रखते हैं | अगर ये FBI SEC आदि के कर्मचारी हमारे भारतीय अफसरों के नोट गिनने के बजाये , अपनी जेब गरम करने की चेष्टा करते , तो क्या हमारे उद्योगपति मना कर देते ?

मुझे तो अंग्रेजों का तर्क ही समझ नहीं आता | एक तरफ ये परेशान रहते हैं की अमीरों के पास पैसा बढ़ रहा है, अमीरों और गरीबों का अंतर बढ़ रहा है | दूसरी ओर, जब कोई अरबपति स्वेच्छा से घूस के रूप में अपना धन ज़रूरतमंदो में बाँटता है, तो ये उसे बदनाम करते हैं !! देखो, हमारे भारतवर्ष में जो आर्थिक, सामाजिक संतुलन है, उसे ये लोग समझ पाएं , इतनी अक्ल इनमें है नहीं | हमारे यहाँ कोई इतना स्वार्थी नहीं है कि  अपने लिए पैसे कमाए | उद्योगपतियों ने अगर कमाया है , तो उसमें से  समुचित भाग नेताओं और अफसरों को दिया है | नेताओं ने भी कभी स्वयं के लिए नहीं लिया|  जो मिला है, उसका समुचित भाग गरीब जनता को ,चुनाव के समय , मदिरा ,या नकद दिया है | बारम्बार, हर चुनाव में दिया है | कोई विश्व में ऐसा मॉडल दिखा दे , अमीरों से धन लेकर ,गरीबों की मदद करने का ! निष्काम सेवा का गीतोपदेश जिस धरती पर मिला हो, ये वही संभव है |

अंग्रेज इस मद में रहे कि प्रजातंत्र उन्होंने हमें सिखाया | हो सकता है , ऊपरी सतह से पढ़ने में ,हमारे संविधान में कुछ समानताएँ भी दिख जाएं | पर भारतीय मॉडल की समझ संविधान या कोई किताब पढ़कर नहीं आ सकती | जैसे किसी ने लिखा थोड़े ही है कि घूस लेना या देना हमारा मौलिक अधिकार है | पर जैसे आत्मा को देखा, छुआ नहीं जा सकता, फिर भी वो है , वैसे ही ये मौलिक अधिकार भी है | या यूं कहें , कि ये अधिकार इतना मौलिक है , कि  इसे देने की जरूरत , संविधान नहीं समझता | आप किसी भारतीय से पूछ लें , कि अगर तेज़ गाडी़ चलाते कोई ट्रैफिक पुलिस वाला पकड़ ले, तो क्या करेगा | उसका एक ही जवाब होगा, कि इस दक्षता के लिए , पुलिस को ५०० तो देने बनते हैं | अंग्रेज इस स्तर पर  सोच ही नहीं पाते | जो नियम क़ानून में लिख दिया , उसके आगे सोच जाती नहीं | खैर ,यही फ़र्क़ है , एक हज़ारों  साल के परिपक्व समाज में , और ये कुछ सौ साल से उपजे देशों में | वो अभी तक योजना बना रहे हैं कि अमीरों पर टैक्स बढ़ाएँगे | फिर सरकार ये धन लेकर , गरीबों का उद्धार करेगी | जबकि ये सर्वविदित है कि सरकार तो होती ही निष्क्रिय है  | ये काम उद्योगपतियों, नेताओं, राजनैतिक पार्टियों, अफसरों और गरीबों को आपस में मिल के कर लेने दो, सब खुश ! 

खैर ऐसा नहीं है कि अंग्रेजों या अमरीकियों का कुछ हो ही नहीं सकता | ये लोग भी विकास कर रहे हैं | सुना है कि  इनके आगामी राष्ट्रपति पर ही किसी महिला को चुप कराने के लिए ब्लैक में पैसे देने और उसके झूठे दस्तावेज व्यापारी खातों में डालने का आरोप है | सीख रहे हैं | आगे आगे ये भी सीख जायेंगे कि  ऐसी बातों पर भला कोई केस करता है !! फिर फर्क ही क्या रह गया एक आम इंसान और राष्ट्राध्याक्ष  में ! भारत विश्वगुरु हो गया है |