Saturday, October 25, 2025

निंदक नियरे राखिये

संभव है आपने भी कबीर के दोहों में ये दोहा याद किया हो| पर बाकी सब की तरह निश्चित ही, आप इसका अर्थ गलत समझते आये होंगे| नहीं जी, कबीर स्वयं की  निंदा करने वाले को साथ रखने की बात नहीं कर रहे| उनका अर्थ है कि दूसरो की निंदा करने वाला आपके समीप रहे तो सुबह की चाय से लेकर, शाम की मदिरा तक, आपकी हर चुस्की में आनंद होगा| काव्य शास्त्र में भले ही नौ रस हों, असल जीवन में एक ही रस है जिसमे घंटो डूब सकते हो - परनिंदा रस| आप मित्रों की कोई मण्डली बैठा लें| फिर उसमे से निंदा हटा दें, तो वार्तालाप पंद्रह मिनट में निपट जाएगा| नीरस बकवास कितनी कर लेगा कोई| परनिंदा वह सूत्र है, जिसमे मित्रता बंधती है| कुछ लोग कहते हैं कि मित्र वो बनते हैं, जिनके विचार या व्यहवार मिलें| मैं कहता हूँ , मित्रता के लिए आवश्यक है कि आप दोनों निंदा पात्र सामान हो! मनोविज्ञान में इसपर अध्यन होना चाहिए| 

हो सकता है कि आप लोग मेरी बात से असहमत हों| पर मैं शास्त्र सम्मत बात कहता हूँ| महाभारत के महायुद्ध में एक ही योद्धा ने अपने रथ पर अपना ही निंदक बैठा रखा था : कर्ण, जिसके सारथि थे शल्य| और क्या हुआ कर्ण भाईसाहब का हश्र? रावण के दरबार में विभीषण था, जो हाँ में हाँ मिलाने की बजाये विरोध करता था| क्या हुआ रावण का हश्र? दूसरी ओर राम के साथ थे आज्ञाकारी लक्ष्मण| हिरण्यकश्यप के समीप प्रह्लाद, तो विष्णु के समीप नारद थे| अब बताएं, क्या कबीर जैसे व्यहवारिक ज्ञानी, स्वयं के निंदक के सानिध्य को श्रेष्ट कह सकते हैं? मुद्दा केवल प्राचीन काल तक सीमित नहीं है| ट्रम्प से लेकर मोदीजी तक, आप सफलतम व्यक्तित्व देखें, और सोचें की इनके समीप इनके निंदक हैं या चाटुकार? खैर, चाटुकारों के महत्व पर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी, अभी विषय वस्तु पर वापिस आते हैं: परनिंदा| 

जैसे माया के तीन नाम बताये गए हैं, ऐसे ही परनिंदा भी पहले चुगली, फिर निंदा, और अंततः आलोचना कहलाती है| जब घरेलु महिलायें करें तो चुगली, राष्ट्राध्यक्ष करें तो आलोचना| नारी सशक्तिकरण तब मानें हम, जब ग्रहणी के वचन आलोचना कहलाएं| खैर, मेरी उम्र के लोगों को याद होगा कि भारत के कितने ही रक्षा मंत्रियों का कार्यकाल तीखी आलोचना करते हुए निकल गया| सिपाही होने के लिए बन्दूक चलानी आनी चाहिए, मंत्री बनने के लिए ज़ुबान ...... मेरा मतलब है कि मंत्री जी को आलोचना की कला में निपुण होना चाहिए|  यूं कहें, निंदा मित्रों को जोड़ती है, तो आलोचना समुदाय और राष्ट्र को| ट्रम्प ने भारत की निंदा करी, तो मोदीजी चीन और रूस के नज़दीक नज़र आने लगे| चीन ने आलोचना करी थी, तो QUAD बन गया था|

कुछ लोगों को लगता है कि सरकार अपनी वैधता संविधान से पाती है| ये सतही विचार है| सदियों से देश बिना संविधान के चल रहे थे, तो क्या वह अवैध थे? कुछेक देशों में तो आज भी संकलित संविधान नहीं है|  जी नहीं , सरकार अपनी पहचान, अपनी वैधता, अपना अस्तित्व, पिछली सरकार की निंदा से अर्जित करती है| अंग्रेज़ो ने हमें समझाया, कैसे मुग़ल अपनी अय्याशी पर देश का धन लुटा रहे थे| कैसे अवध के नवाब भोग-विलास में लिप्त, प्रशासन कार्य में दिल नहीं लगा रहे थे| फिर कांग्रेस ने समझाया की कैसे अंग्रेज लूट रहे थे| नेहरू जी और फिर उनका परिवार, दशकों तक देश और लूट के बीच खड़ा हो गया..... लूट को परिवार .... म्म्म्मेरा मतलब है.. देश..... के बाहर जाने नहीं दिया| वो तो मोदीजी ने बताया कि इस चक्कर में विकास रुक गया| प्रदेशों के स्तर पर और भी अच्छा संतुलन है| दिवाली पर देश की राजधानी की हवा बिगड़ी तो आम आदमी पार्टी ने दिल्ली सरकार की निंदा करी| तुरंत कार्यवाही करते हुए, दिल्ली सरकार ने पंजाब सरकार की निंदा कर दी| मुझे तो बड़ा सुकून रहता है, कि मेरे जैसे नागरिकों  के लिए बीस पच्चीस पार्टियाँ एक दुसरे की निंदा कर रही हैं|

दरअसल यही अंतर है, महापुरुषों और साधारण जन में| मैस्लोव नामक मनोविगयानिक ने बताया था, कि मनुष्य के अपने विकास के क्रम में कैसे उसकी रुचि, उसकी जिज्ञासा और उसके उद्देश्य परिवर्तित होते हैं| पर यह सब जटिल  किताबी बातें हैं| आप जैसे साधारण लोगों को समझ नहीं आने वालीं| मैं आपको सरल सी बात बताता हूँ| अगर आपकी निंदा किसी तर्क पर आधारित है, तो आपका बौद्धिक स्तर बच्चों वाला है - जी इसने मेरी पेंसिल ले ली , इसलिए  इसे भला बुरा कहूंगा| अगर आपकी निंदा, तर्क से तो परे हो चुकी है, पर भावनाओ में अटकी है - तो आप साधारण हैं| पर अगर आप, तर्क और भावना, दोनों से ऊपर उठते हुए परनिंदा बिना बात कर सकें और  सुविधानुसार निंदा पात्र बदल सकें - फिर आप महापुरुष हैं या उस ओर अग्रसर हैं| फिर आप राजनीति द्वारा देश और समाज की सेवा करने लायक हो चुके हैं|